सावन कुमार टाक

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#25aug 
सावन कुमार टाक 
🎂09 अगस्त 1936 
जयपुर , जयपुर राज्य , ब्रिटिश भारत (वर्तमान जयपुर , राजस्थान , भारत )
⚰️25 अगस्त 2022 
मुंबई,महाराष्ट्र , भारत
एक भारतीय फिल्म निर्देशक, निर्माता और गीतकार थे।  उन्होंने कई हिंदी फिल्मों का निर्देशन किया है, जिनमें गोमती के किनारे, सौतन, सौतन की बेटी, सनम बेवफा और बेवफ़ा से वफ़ा शामिल हैं।  उन्हें संजीव कुमार और जूनियर महमूद जैसे अभिनेताओं को ब्रेक देने का श्रेय दिया जाता है।

सावन कुमार ने 1967 में संजीव कुमार अभिनीत फिल्म नौनिहाल से निर्माता के रूप में अपना फिल्मी कैरियर शुरू किया उनके निर्देशन की शुरुआत फिल्म गोमती के किनारे (1972) के साथ हुई थी, जो मीना कुमारी की आखिरी फिल्म थी, और यह फ़िल्म मीना कुमारी के मरणोपरांत रिलीज हुई थी वह एक अच्छे गीतकार भी थे और उन्होंने अपनी अधिकांश निर्मित और निर्देशित फिल्मों के लिए गीत लिखे हैं  इसके अलावा, उन्होंने अन्य फिल्म निर्माताओं द्वारा निर्मित और निर्देशित फिल्मों के गीतों के बोल भी लिखे हैं  इनमें शत्रुघ्न सिन्हा और पूनम अभिनीत 1973 की फिल्म "सबक" का लोकप्रिय गीत "बरखा रानी जरा जमके बरसो" शामिल हैं।  उन्होंने फिल्म कहो ना... प्यार है के कुछ गाने लिखे और 2004 की फिल्म देव के सभी गाने लिखे हैं। उन्होंने अपनी खुद की फिल्म के कुछ बहुत लोकप्रिय गीतों के बोल भी लिखे हैं जैसे "तेरी गलियों में ना रखेंगे क़दम" फ़िल्म हवस रफी द्वारा गाय हुआ "जिंदगी प्यार का गीत है"फ़िल्म सौतन, "हम भूल गए रे हर बात मगर तेरा प्यार नहीं भूले" फ़िल्म सौतन की बेटी, "ये दिल बेवफा से वफ़ा कर रहा है " फ़िल्म बेवफ़ा से वफ़ा सभी गीतों को लता मंगेशकर ने गाया है।
सावन ने एक इंटरव्यू में बताया था, 'मैंने अपनी बहन से 25 हजार रुपए उधार मांगे थे फिल्म को प्रोड्यूस करने के लिए मेरे पास एक आइडिया था कि एक अनाथ बच्चा है जिसके स्कूल के प्रिंसिपल ने बताया है कि पंडित नेहरू उसके रिश्तेदार हैं। मेरी बहन ने फिल्म के आइडिया को रिजेक्ट कर दिया था लेकिन, मेरे जीजाजी मान गए थे।' सावन की पहली फिल्म नौनिहाल बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप हुई थी। हालांकि, उनकी इस फिल्म को नेशनल अवॉर्ड में प्रेसिडेंट मेंशन मिला था। 

सावन ने साल 1972 में फिल्म गोमती के किनारे डायरेक्ट की थी। बतौर डायरेक्टर ये उनकी पहली फिल्म थी। इस फिल्म में मीना कुमारी और मुमताज अहम रोल में थे। ये फिल्म मीना कुमारी की आखिरी फिल्म थी। सावन कुमार टाक ने सलमान खान के साथ सनम बेवफा, चांद का टुकड़ा जैसी कई फिल्मों में काम किया है। सावन कुमार टाक की आखिरी फिल्म साल 2006 में सावन द लव सीजन रिलीज हुई थी। इस फिल्म में सलमान खान लीड रोल में थे। प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के अलावा सावन एक लेखक और गीतकार भी थे।

सावन कुमार और मीना कुमारी की पहली मुलाकात भी कम दिलचस्प नहीं थी रिपोर्ट्स के मुताबिक सावन कुमार टाक और मीना कुमारी की पहली मुलाकात फिल्म 'गोमती के किनारे' के सेट पर हुई थी। एक बातचीत में सावन कुमार ने कहा था, 'मेरे फिल्ममेकर दोस्त बी एन शर्मा को लगता था कि इस रोल में सिर्फ मीना कुमारी ही जचेंगी। वह बहुत बड़ी स्टार थीं, पर मैंने उन्हें हिम्मत करके फोन किया। मीना कुमारी जी की बहन ने फोन उठाया। मुझे घर बुलाया गया। मीना जी यह देख हैरान थीं कि एक बेहद कम उम्र का लड़का उन्हें कहानी सुना रहा है।' इसके बाद मीना कुमारी ने सावन कुमार टाक की 'गोमती के किनारे' साइन कर ली। फिल्म 'गोमती के किनारे' की आधी शूटिंग ही हुई थी कि मीना कुमारी बीमार पड़ गईं। सावन कुमार की फिल्म बीच में अटक गई। फिल्म की शूटिंग 1968 में शुरू हुई थी, लेकिन यह 1972 में रिलीज हुई। भले ही फिल्म में वक्त लगा, लेकिन इस दौरान सावन कुमार को मीना कुमारी से लगाव हो गया था। एक किस्सा बताते हुए उन्होंने कहा था, 'मीना जी एक रात मुझे अपने बेडरूम में ले गईं। उनकी इमेज एक ट्रैजिडी क्वीन की थी, पर वह खूब मजाक करती थीं। उनकी कहानियां सुनकर मैं खूब हंसा। बाद में उन्होंने अपने बिस्तर पर गुलाब की पंखुड़ियां बिछाईं और सो गईं। मैं कार्पेट पर बैठा और बेड पर सिर टिकाकर सो गया।'

सावन कुमार ने बताया कि उस दिन के बाद से वह रोजाना मीना कुमारी के लिए फूल खरीदकर ले जाते। उन्हें फूल बहुत पसंद थे। मीना कुमारी को खुश देखकर सावन कुमार भी खूब खुश होते। पर वह यह देखकर दुखी भी थे कि वह बहुत बीमार हैं। उनकी हालत दिन-ब-दिन बिगड़ रही थी। सावन कुमार के मुताबिक, 'वह उल्टियां करतीं तो खून निकलता था। मैं उसे अपने हाथ में ले लेता। उनका चेहरा साफ करता और फिर सुला देता।' सावन कुमार ने एक बातचीत के दौरान कहा था, 'मेरा मीना जी के साथ इबादत का रिश्ता था। वह मेरी दुनिया थीं। एक बार मीना जी ने मुझसे कहा था कि तुम पहले ऐसे इंसान हो, जिसमें मैंने भगवान देखा है। मैं तुम्हारे हाथ पर जो खून भरी उल्टी करती हूं, तुम उसे इकट्ठा करते हो तुम एक बार भी जाहिर नहीं करते कि अच्छा नहीं लग रहा। आज तक मेरे साथ न तो मेरी बहनों ने और न ही किसी दोस्त या रिश्तेदार ने ऐसा किया। मेरी बेडशीट पर दाग भी लग जाता तो मैं खुद ही उस बदलती थी।' मीना कुमारी ने भी सावन कुमार के मुश्किल वक्त में खूब मदद की थी रिपोर्ट्स के मुताबिक फिल्म 'गोमती के किनारे' बनाते वक्त सावन कुमार के सारे पैसे खत्म हो गए थे मीना कुमारी ने यह देख उनके लिए अपना बंगला तक बेच दिया था।
 
मीना कुमारी की यादों के झरने

मीना कुमारी की मौत का कारण शराब माना जाता है। विनोद मेहता ने चर्चित पुस्तक "मीना कुमारी' में सावन कुमार टाक को "मीना कुमारी के जीवन का आखिरी शख्स' बताते हुए टाक के हवाले से लिखा है,"1968 में लंदन में इलाज कराकर लौटने के बाद मीना कुमारी ने न केवल खुद शराब नहीं पी, बल्कि मुझे भी नहीं पीने दी।'
 
 
सावन कुमार टाक ने मीना कुमारी को फिल्म "गोमती के किनारे' की कहानी सुनाकर पूछा था कि आप डायरेक्टर किसे लेना चाहेंगी? इस पर उन्होंने कहा-"जिसने मुझे दिलकश अंदाज में कहानी सुनाई, वही डायरेक्टर होगा।' इस तरह सावन कुमार निर्देशक भी बन गए। वो मीना कुमारी को याद करते हुए कहते हैं-"हमारी दोस्ती हो गई थी।
 
उनका जब निधन हुआ तब मैं उनके घर पर ही था। शाम को कब्रिस्तान में मैं दूर जाकर बैठ गया, ख़यालों में डूबा रहा। मैं रोया नहीं, लेकिन जब उनकी कब्र पर मेरे हाथ से मिट्‌टी नीचे गिर रही थी, तब आंखों से आंसू झर रहे थे।'

सावन कुमार की फिल्म यात्रा “नौनिहाल’ से शुरू हुई। वे घर से भागकर हीरो बनने गए थे, लेकिन फिल्म निर्माता के रूप में सफर शुरू किया। इसके बाद मीना कुमारी को लीड रोल में लेकर “गोमती के किनारे’(1972) बनाई। मीना कुमारी की यह आखिरी फिल्म थी, जो उनके निधन के बाद रिलीज हुई। कमलेश्वर की कहानी पर राजेंद्र कुमार और नूतन को लेकर बनाई गई फिल्म “साजन बिन सुहागन’(1978) ने गोल्डन जुबली मनाई। कमलेश्वर की कहानी पर ही-”सौतन’ (1983), जिसमें राजेश खन्ना, टीना मुनीम और पद्मिनी कोल्हापुरे मुख्य भूमिका में थे।
 
सलमान खान को लेकर बनाई “सनम बेवफा’ (1991) ने भी सिल्वर जुबली मनाई। ज्यादातर फिल्मों में गीत सावन कुमार ने ही लिखे और संगीत उनकी पत्नी रहीं उषा खन्ना ने दिया 
 
वे जब 20 वर्ष के थे, तब 1956 में मां के 42 रुपये चुराकर मुंबई भाग गए। दस साल संघर्ष करते रहे,  घर वालों ने कहा कि वापस आ जाओ। इस पर उनका जवाब था-”जिन पुलों से मैं आया था, वे सब मैंने जला दिए हैं, इसलिए अब नहीं लौट सकता।’
 
उनके बुलंदियों पर जाने की सीढ़ी 27 मई, 1964 को तब तैयार हुई जब वे एक दोस्त से मिलने हैदराबाद जा रहे थे और रास्ते में जवाहर लाल नेहरू के निधन की खबर आई। ट्रेन के डिब्बे में सब रो रहे थे और उनके मन में फिल्म की एक कहानी तैयार हो रही थी। दोस्त ने फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया और बुआ की लड़की से 25 हजार रुपये लेकर उन्होंने फिल्म बनाई-”नौनिहाल’। फिल्म नहीं चली, लेकिन सावन कुमार टाक चल गए
 
इनको दिया ब्रेक 
सावन कुमार ने पहली फिल्म "नौनिहाल' में संजीव कुमार को मौका दिया और उनका नाम हरी भाई जरीवाला से संजीव कुमार किया। "हवस' में नीतू सिंह को ब्रेक दिया। "साजन बिन सुहागन' में पद्मिनी कोल्हापुरे और "लैला' में अनिल कपूर को अवसर दिया।
 
टाक के नजदीकी लोगों में एक पूर्व सांसद महेश जोशी ने एक किस्सा सुनाया-"एक बार विमान में डैनी और पंकज धीर जा रहे थे तो उनसे कुछ लड़कियों ने कहा कि वे भी फिल्मों में भाग्य आजमाने गई थीं, लेकिन चांस नहीं मिला। तब पंकज धीर ने कहा-"आप सावन कुमार से क्यों नहीं मिलीं?'
 
नूतन के घर घूमते थे सांप 

सावन कुमार टाक ने एक बार बताया-"फिल्म "साजन बिन सुहागन' के लिए नूतन को साइन करने मैं उनके घर गया। कार से उतरा तो देखा कि सामने सांप ही सांप घूम रहे थे। मेरे पसीने छूट गए। नूतन एक छड़ी लेकर निकलीं और उससे सांपों को हटाकर रास्ता बनाते हुए कहा-"डरो मत, आ जाओ।' अंदर गया तो वहां भी सांप घूम रहे थे। सोफे पर बैठा तो नीचे सांप आ गए और मैंने दोनों पैर ऊपर कर लिए। नूतन ने कहा-"कुछ नहीं होगा। ये अच्छे बच्चे हैं।' मैंने जल्दी-जल्दी उन्हें साइनिंग चेक दिया और वहां से भागा।'

25 अगस्त 2022 में 86 साल की उम्र में मुंबई में उनका निधन हो गया।
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1972 गोमती के किनारे
1974 हवस
1977 अब क्या होगा
1978 साजन बिना सुहागन
1980 ओह बेवफा
1981 साजन की सहेली
1983 सौतन
1984 लैला
1986 प्रीति
1987 प्यार की जीत
1989 सौतन की बेटी
1991 सनम बेवफा
1992 बेवफ़ा से वफ़ा
1993 खल-नायिका
1994 चाँद का टुकड़ा
1995 सनम हरजाई
1997 सलमा पे दिल आ गया
1999 माँ
2003 दिल परदेसी हो गया
2006 सावन

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