N A अंसारी
#29aug #11jan
अभिनेता निर्माता निर्देशक एन ए अंसारी
29 अगस्त 1917,
झांसी
मृत्य: 11 जनवरी 1993,
पोर्ट कोलबोर्न, कनेडा
आकर्षक व्यक्तित्व भावहीन चेहरा सामने वाले को भेदती आँखे कुल मिलाकर एक खलनायक की सारी खूबियां लेकिन निसार अहमद अंसारी का इतना सा परिचय नही है दो दशक तक रहस्य और अपराध के कथानक पर बनी हिंदी फिल्मों में एक लेखक एक निर्देशक के तौर पर भी उनका अहम योगदान रहा है
निसार अहमद अंसारी फिल्मों में एन ए अंसारी और अंसारी के नाम से पहचाने गये
29 अगस्त 1917 को उनका जन्म उत्तर प्रदेश के झांसी में हुआ था अंग्रेजी में एम ए करने के बाद 1939 में अंसारी अपने एक रिश्तेदार से मिलने बम्बई पहुँचे यह शहर उन्हें इतना भा गया कि वही बसने को योजना बनाने लगे सिनेमा के रोमांच में जकड़े जा चुके अंसारी को मुम्बई में आसानी से विदेशी फिल्में देखने का मौका मिल रहा था और वे उसे छोड़ना नही चाहते थे
यह महज एक इत्तेफाक था कि एक दिन अंसारी की फिल्मकार महबूब से विस्तार से मुलाकात हो गयी महबूब उन दिनों अपनी फिल्म औरत बनाने की तैयारी कर रहे थे
महबूब उनसे प्रभावित हुए और औरत में एक छोटा सा रोल दे दिया (1943 )महबूब खान ने नजमा फ़िल्म बनाई इसमे भी अंसारी को एक अहम रोल मिला बचपन से ही जासूसी साहित्य के दीवाने अंसारी को को लगता था कि जासूसी कहानियों पर जैसी फिल्में बन सकती है वैसी बन नही रही है तभी अंसारी की अभिनेता शेख मुख्तार से दोस्ती हो गयी 1956 में शेख मुख्तार ने फ़िल्म मिस्टर लंबू बनाई जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी अंसारी को सौंप दी अंसारी ने मिस्टर लंबू में एक अहम रोल भी अदा किया
इस फ़िल्म की सफलता ने अंसारी को एक निर्देशक के तौर पर स्थापित कर दिया उनके निर्देशन में अगली फिल्म थी मंगू जो 1954 में बनी थी मगर अंसारी को अगली फिल्म का निर्देशन करने में पांच साल का इंतेज़ार का करना पड़ा इस बीच वे फिल्मों में अभिनय जरूर करते रहे (1959) में जी पी सिप्पी ने फ़िल्म ब्लैक कैट के लिए अंसारी को कहानी लेखक एवं निर्देशक के तौर पर साइन किया
इसके बाद वांटेड (1961)और टावर हाउस (1962) अंसारी की लिखी कहानियों पर आधारित और उनके ही निर्देशन में बनी वे फिल्में थी जो अपने समय मे काफी चर्चित रही
अब अंसारी को लग रहा रहा कि उन्हें भी फ़िल्म निर्माण में हाथ डालना चाहिये उन्होंने बुंदेलखंड फ़िल्म नाम से अपनी कम्पनी खड़ी की और उसके तहत पहली फ़िल्म बनाई मुलजिम (1963) लेकिन अगली तीन फिल्में ज़िंदगी और मौत(1965)वहां के लोग (1967) और मिस्टर मर्डरर 1969 वो परिणाम नही दे पाई जैसी अंसारी को उम्मीद थी (1974) में फ़िल्म जुर्म और सज़ा अपराध पर बनाई गई उनकी अंतिम फ़िल्म थी हालांकि इस बीच वे दूसरे निर्देशकों की बनाई फिल्मों में काम कर रहे थे रंगा खुश (1975) हरफनमौला (1976) महाबदमाश (1975) में ही कुछ ऐसी फिल्में थी
अंसारी के निर्देशन में अंतिम फ़िल्म बनी नूर-ए-इलाही (1977) लेकिन तेज़ी से बदलते माहौल में धीरे धीरे अंसारी रुपहले पर्दे से दूर होते चले गये
11 जनवरी 1993 को कनाडा में अपने पुत्र के पास निसार अहमद अंसारी का निधन हो गया।
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